ऐ मालिक तेरे बंदे हम
ऐसे हो हमारे करम,
नेकी पर चलें और बदी से टलें
ताकि हंसते हुये निकले दम ll धृ ll
जब ज़ुलमों का हो सामना,
तब तू ही हमें थामना.
वो बुराई करें,हम भलाई भरें
नहीं बदले की हो कामना,
बढ़ उठे प्यार का हर कदम और मिटे बैर का ये भरम ll १ ll
ये अंधेरा घना छा रहा,
तेरा इनसान घबरा रहा.
हो रहा बेखबर, कुछ न आता नज़र, सुख का सूरज छिपा जा रहा.
है तेरी रोशनी में वो दम,
जो अमावस को कर दे पूनम ll २ ll
बड़ा कमज़ोर है आदमी,
अभी लाखों हैं इसमें कमीं.
पर तू जो खड़ा,है दयालू बड़ा,
तेरी कृपा से धरती थमी,
दिया तूने हमें जब जनम.
तू ही झेलेगा हम सबके ll ३ ll
रचनाकार : भरत व्यास
इतनी शक्ति हमें देना दाता,
मन का विश्वास कमज़ोर हो ना.
हम चलें नेक रस्ते पे हमसे,
भूलकर भी कोई भूल हो ना ll धृ ll
दूर अज्ञान के हो अँधेरे,
तू हमें ज्ञान की रौशनी दे.
हर बुराई से बचके रहें हम,
जीतनी भी दे भली ज़िन्दगी दे.
बैर हो ना किसी का किसी से,
भावना मन में बदले की हो ना ll १ ll
हम न सोचें हमें क्या मिला है,
हम ये सोचें किया क्या है अर्पण.
फूल खुशियों के बांटें सभी को,
सबका जीवन ही बन जाए मधुबन.
अपनी करुणा को जल तू बहा के
कर दे पावन हर एक मन का कोना ll२ll
हम अँधेरे में हैं रोशनी दे,
खो ना दे खुद हो ही दुश्मनी से,
हम सज़ा पायें अपने किए की
मौत भी हो तो सह ले ख़ुशी से.
कल जो गुज़ारा है फिर से ना गुज़रे,
आने वाला वो कल ऐसा हो ना ll ३ ll
हर तरफ़ ज़ुल्म है बेबसी है, सहमा-सहमा सा हर आदमी है.
पाप का बोझ बढ़ता ही जाए,
जाने कैसे ये धरती थमी है.
बोझ ममता का तू ये उठा ले तेरी रचना का ये अंत हो ना ll ४ ll
रचनाकार : अभिलाष
मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे ॥धृ॥
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे,
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए,
छतों पर अब न सोते हैं
कहानी किस्से अब न होते हैं..ll१ll
आंगन में वृक्ष थे
सांझा करते सुख दुख थे,
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था,
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे ll२ll
इक साइकिल ही पास थी
फिर भी मेल जोल की आस थी,
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे,
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था ll३ll
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे,
अब शायद कुछ पा लिया है
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया है,
जीवन की भाग-दौड़ में
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है ?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है ll४ll
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम
और आज कई बार
बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है !!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते,
खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते,
मकान चाहे कच्चे थे..
रिश्ते सारे सच्चे थे ll५ll
रचनाकार : हरिवंशराय बच्चन
ह्या उन्हाच्या भर गर्दीत
रंगीबेरंगी पानांच्या
सावळ्या सावलीतून
डोकावताना याआधी कधी
दिसलाच नाही
निष्पर्ण फांद्यांना
'ती' च्या क्षितिजावर
धडपडणारा पांढरा ठिपका..
सुखाच्या काठावरून
चालत गेले
भीतीचे पाऊल तरी
खडकाळ वाटेत
सांजही थांबली नाही
'ती' च्या मातीला
आणखीन एखादा थर द्यायला..
बंदिस्त काळोखात
मनमानीशी झाले करार
दोन हातात वसताना
त्या इवल्याशा बोटांना पाहताना
वाटलच नसेल काय
'ती' च्या उजेडाला
तोडून टाकावेत
घर म्हणवणारे तुरुंग..?
काळ जाणे
तराजू सांगू लागला त्यावेळी
अमावस् कशी अवघड असते
अन उघडले दार
डोळ्यांवर काळी पट्टी तरी
'ती' च्या कलांना
मध्यरात्री का होईना..
कोरडे व्हावेत
अति भिजलेले रस्ते आणि
थरथरत्या दवांना मिळावी ऊब
सुचावं क्षणात
आता पुढं दरी असेल तर ?
'ती' च्या प्रेमळ भावनांना..
आरसा फिका पडावा
इतकी सोबत
ओंजळ व्हावी की
जुन्या जगण्याला मरण प्रिय होईल
आठवांची नदी मग
पुन्हा-पुन्हा लाट होताना
सारंग एका लिफाफ्यात
मेहरबान शब्दांना
हळूच बंद करू लागेल
तेव्हाच 'ती' च्या पहाटेला
डोंगरकडा चंदेरी व्हायला
सुरवात होईल मावळतीकडे झुकेल शुक्राचा अविर्भाव
अशात दरवळेल पारिजात सुद्धा आणि सतत गात राहील
'ती' चा विरोधाभास अगदी अनुरूप
ठरत असला तरी,
"चंद्राच्या जागी..चंद्रच.."
रचनाकार : अन्नू
स्वप्नरंजनास आता मिळू दे स्पर्शाची वाट
चालू त्यावरून देवून हातात-हात
अन उमटतील चार-चार पाऊलखुणा
'एकाचवेळी..'
नजरेच्या कुपीत प्रेमाचा सुगंध
परि ओठांवर संकोच दरवळताना
उमलली जरा कुठे निमित्ताची फुले
भारला श्वास मिटतो डोळे आजही
'एकाचवेळी..'
उरात होई काहूर अनावर
ईश्वर सावरे त्याहूनही
आनंदाची येई भरती
कधी दिसे काळजीची गर्ता
'एकाचवेळी..'
तल्लीन तुला रुजवात करण्यात
अधीर तुही वसावे माझ्या काळजात
ठाव जुळणार तरी अंतर मनाजोगते
जणू चंद्र तू मी चांदणे
'एकाचवेळी..'
रचनाकार : अन्नू
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप,
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप,
मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप,
बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग,
या आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप,
नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को,
और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें,
और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।
आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप,
नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को,
जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को,
अपने जीवन में कम से कम एक बार,
किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं....!!
रचनाकार : मार्था मेडेइरोस
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